पाण्डुलिपि-विज्ञान की शाखाएँ एवं उपादेयता

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पाण्डुलिपि-विज्ञान की शाखाएँ एवं उपादेयता
प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण की समस्या (राजशेखर की काव्यमीमांसा के अनुसार)
राजशेखर ने अपनी कृति ‘काव्यमीमांसा’ में हस्तलिखित ग्रंथों के पाठ-संक्रमण की असुरक्षा और भविष्य की आशंकाओं को व्यक्त किया है। उन्होंने निर्देश दिया है कि –
सिद्धं च प्रबन्धम् अनेकादर्शगतं कुर्यात् ।
अर्थात्, जब कोई ग्रंथ या प्रबंध सिद्ध (तैयार) हो जाए, तो उसकी अनेक प्रतिलिपियाँ (आदर्श प्रतियाँ) बना लेनी चाहिए।
काव्य (ग्रंथ) की महाआपत्तियाँ (महापदः) –
ग्रंथों के नष्ट या विकृत होने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –
निक्षेपो (दूसरों के पास धरोहर रखना)
विक्रयो (बेच देना)
दानम् (दान कर देना)
देशत्यागो (देश छोड़कर चले जाना)
अल्पजीवितम् (अल्पायु होना)
दारिद्र्यम् (ग़रीबी)
व्यसनावगतिर् (व्यसनों/बुरी आदतों में फँसना)
अवज्ञा (ग्रंथ का आदर न करना)
मन्दभाग्यता (दुर्भाग्य)
दुष्टे द्विष्टे च विश्वासः (दुष्ट या शत्रु पर भरोसा करके ग्रंथ सौंपना)
एताः काव्यस्य महापदः ।।
लिपिकारों का कष्ट और प्रार्थना –
पाण्डुलिपियों के अंत में अक्सर लिपिकार अपनी शारीरिक मेहनत और पाठकों से ग्रंथ की सुरक्षा की मार्मिक अपील करते हैं –
भग्नपृष्ठिकटिग्रीवः स्तब्धदृष्टिरधोमुखः ।
कष्टेन लिखितं पुस्तं यत्नेन परिपालयेत् ।।
(पीठ, कमर और गर्दन को तोड़कर, दृष्टि को स्थिर रखकर और मुख नीचे करके अत्यंत कष्ट से इस पुस्तक को लिखा गया है, अतः यत्नपूर्वक इसकी रक्षा करें।)
तैलाद् रक्षेज् जलाद्रक्षेद् रक्षेच्छिथिलबन्धनात् ।
मूर्खहस्ते न दातव्यमेवं वदति पुस्तकम् ।।
(तेल से रक्षा करें, जल से रक्षा करें, और ढीले बंधन से रक्षा करें। मुझे किसी मूर्ख के हाथ में न सौंपें—ऐसा पुस्तक स्वयं कहती है।)
वैदिकेतर रचनाओं का अनियन्त्रित पाठसंचरण
यान्त्रिक प्रतिलिपिकरण का अभाव – प्राचीन और मध्यकाल में आधुनिक प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी या प्रेस का सर्वथा अभाव था (भारत में पहला प्रेस लगभग 1850 में आया)। इसलिए ज्ञान का संक्रमण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक या मानवकृत लिखित रूप में ही होता था।
लिप्यासन (Writing Surfaces) की नश्वरता – भारत की आरण्यक संस्कृति में वनस्पतिजन्य सामग्री जैसे ताड़पत्र (Palm-leaf) और भूर्जपत्र (Birch-bark) का लिप्यासन के रूप में प्रयोग होता था। कागज (कागज शब्द पेपायरस से बना है) बहुत बाद में आया।
पाठ भ्रष्ट होने के कारण – ताड़पत्रों और भूर्जपत्रों की दुर्लभता तथा स्थान के संकोच के कारण लिपिकार सघन लिखते थे। मानव की सहज प्रकृति भूल करने की होती है। हस्तलिखित प्रतियों के निर्माण की लंबी परंपरा में निम्नलिखित कारणों से मूल लेखक या कवि के पाठ में बहुविध भ्रष्टता (Corruptions) प्रविष्ट होती गई –
अज्ञान और अनवधान (प्रमाद)
अति-पाण्डित्य (लहिया द्वारा अपनी ओर से सुधार की चेष्टा)
शारीरिक अक्षमता (वृद्धावस्था, कम दिखाई देना)
लिपि-भ्रम (एक जैसे अक्षरों को गलत पढ़ना)
आकस्मिक कारण (दीमक, कीड़े, चूहे, सीलन, शिथिल बंधन और सूर्य की किरणें)
आलोचना के दो प्रकार
जब हस्तलिखित प्रतियों में पाठ एकरूप नहीं रहता, तब पाठ की प्रामाणिकता निश्चित करने के लिए आलोचना (विवेचन) अनिवार्य हो जाती है –
पाठालोचन (Textual Criticism) –
पाण्डुलिपियों में उपलब्ध किसी कृति के लिखितांश को लेकर जब यह तार्किक प्रश्न उठाया जाता है कि—“क्या कवि या शास्त्रकार ने मूल रूप से यही लिखा था?” और इस दृष्टि से परम्परागत पाठ की परीक्षा की जाती है, तो उसे ‘पाठालोचन’ कहते हैं।
साहित्यालोचना (Literary Criticism) –
जब काव्यशास्त्रीय मानदंडों के आधार पर ग्रंथ के अलंकार, वस्तु-ध्वनि, चरित्र-चित्रण, रस आदि विषयों की समीक्षा की जाती है, तो उसे ‘साहित्यालोचना’ कहते हैं।
महत्वपूर्ण सिद्धांत – Any literary criticism should be preceded by the textual criticism. (साहित्यालोचना से पहले पाठालोचन होना अनिवार्य है, अन्यथा नए पाठान्तर मिलने पर पुरानी समीक्षाएं गलत सिद्ध हो सकती हैं)।
पाण्डुलिपि (Manuscript/मातृका) और पाठ (Text) की परिभाषा
पाण्डुलिपि – कानूनी दृष्टि से या सामान्य परिभाषा में, जो दस्तावेज़ मानवकृत हस्ताक्षर या हस्तलिखित हो और 75 से अधिक वर्ष पुराना हो, उसे पाण्डुलिपि (मातृका या मैन्युस्क्रिप्ट) कहते हैं।
पाठ (Text) – यः श्रूयते, यः पठ्यते – सः पाठः कवि या शास्त्रकार की कोई भी रचना जो मौखिक या लिखित परंपरा से संचरित हुई हो, उसे पाठ कहते हैं। इसके अंतर्गत चार रूप आते हैं –
ऐतिहासिक सूचना देने वाले लिखितांश
धार्मिक ग्रंथ
मानवीय संवेदनाओं से सम्बद्ध काव्य-साहित्य
ज्ञान एवं विज्ञान का निरूपण करने वाले लिखित दस्तावेज़
पाठालोचन का लक्ष्य – पाण्डुलिपियों में संचरित अशुद्ध, त्रुटित या भिन्न-भिन्न पाठान्तरों में से जो प्राचीनतम, मौलिक या अधिक श्रद्धेय (प्रामाणिक) हो, उसकी गवेषणा (खोज) करना तथा अशुद्धियों को हटाकर मूल ग्रन्थकार के अभीष्ट ‘मौलिक पाठ’ को पुनः प्रतिष्ठित करना।
पाठालोचन के तार्किक सोपान (Steps)
संचयनम् (Heuristics) – पाण्डुलिपियों की खोज और उनका संकलन।
संकलनम् – विभिन्न प्रतियों को एकत्र करना।
संवाचनम् – संलेखनम् – प्रतियों का पाठ पढ़ना और उनका लिप्यन्तरण (Transliteration) करना।
संतुलनम् (Collation) – प्रतियों के पाठों की आपस में तुलना करना (Collation Sheet बनाना)।
संशोधनम् (Recensio) – पाठपरंपरा के वंशवृक्ष और वाचनाओं का निर्धारण।
संदर्शनम् – प्राचीनता एवं साधुता (प्रामाणिकता) का निर्णय करना।
संलेखनम् / प्रकाशनम् – समीक्षित संस्करण (Critical Edition) तैयार कर प्रकाशित करना।
पाठालोचक/संपादक की पूर्व-सज्जाएँ (Prerequisites)
प्राचीन एवं मध्यकाल की एकाधिक लिपियों (ब्राह्मी, शारदा, ग्रंथ, नागरी आदि) का ज्ञान और अभ्यास।
संस्कृत, पालि और प्राकृत भाषाओं का भाषाशास्त्रीय ज्ञान।
पाठ्यग्रंथ में प्रतिपादित विषय (शास्त्र या काव्य) का गहरा ज्ञान।
पाठ-संक्रमण के स्वरूप, इतिहास और समीक्षित पाठ-संपादन के सिद्धांतों की जानकारी।
लिपि-विज्ञान और ग्रन्थागार व्यवस्थापन
लिपि-विज्ञान (Palaeography)
ग्रन्थागार (Manuscriptology)
पाठ-संपादन (Critical Editing)
* लिपि का उद्भव और विकास



* प्रदेशभेद से लिपिभेद



* कालानुक्रम से अक्षरों में बदलाव



* लेखक की लेखनशैली का अभिज्ञान



* अक्षर वाचन और लिप्यन्तरण
* पाण्डुलिपि का स्वरूप और संग्रहण



* क्यूरेटिव एवं प्रिवेंटिव कंजर्वेशन (संरक्षण)



* कैटालॉगिंग (विवरणात्मक ग्रंथसूची)



* डिजिटाइजेशन (स्कैनिंग, फोटोग्राफी)
* पाण्डुलिपि-प्राप्ति और सहायक-सामग्री



* संतुलन-पत्रिकाएँ (Collation Sheets)



* पाण्डुलिपियों का वंशवृक्ष (Stemma)



* प्राचीनतम पाठ का पुनर्गठन व प्रकाशन
ब्राह्मी लिपि और उसकी वंशज लिपियाँ
प्राचीनतम ब्राह्मी लिपि (बुद्ध के समय ई.पू. 600–500 में प्रचलित) से ही भारत की अधिकांश लिपियों का विकास हुआ। सम्राट अशोक के लेखों (ई.पू. 273) में इसका प्रौढ़ रूप मिलता है। ई.स. 350 के बाद यह दो मुख्य शाखाओं में विभाजित हुई –
उत्तरभारतीय शाखा –
गुप्त-कालिक ब्राह्मी (ई.स. 400 से 500)
कुटिलाक्षर / सिद्धमातृका (ई.स. 600 से 800)
पश्चिमोत्तर शाखा – शारदा लिपि (8वीं शती), जिससे टाकरी, लण्डा, डोंगरी और गुरुमुखी विकसित हुईं।
मध्य-पूर्व-उत्तर शाखा – पुरानी नागरी लिपि, जिससे देवनागरी (11वीं शती), मैथिली (11वीं शती), बंगाली (13वीं शती), उड़िया (13वीं शती) और गुजराती (15वीं शती) का विकास हुआ।
दक्षिणभारतीय शाखा –
तमिल-ब्राह्मी (600 ई.स.)
नन्दि-नागरी (राष्ट्रकूट काल, 850 ई.स.)
ग्रंथ-लिपि (जिससे मलयाळम् विकसित हुई), तेलुगु और कन्नड़ (ये दोनों 1300-1400 ई.स. में अलग हुईं)।
सुवर्णाक्षरों में लिखित पाण्डुलिपि एवं आधुनिक लेखन
सुवर्णाक्षरी पाण्डुलिपि – सोने की मसी (स्याही) से लिखे गए ग्रंथों के अत्यंत आकर्षक निदर्श जैन ज्ञान भंडारों में सुरक्षित हैं।
क्या आज भी पाण्डुलिपियाँ लिखी जाती हैं?
हाँ, अहमदाबाद के ‘श्रुतलेखनभवन’ में आज भी प्रामाणिक पद्धति से जैनागमों की पाण्डुलिपियाँ लिखवाई जाती हैं।
काशी के मूर्धन्य विद्वान प्रो. रेवाप्रसाद द्विवेदी ने अपने हस्तक्षरों में कालिदास के काव्यों (मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्) की ब्राह्मी लिपि में पाण्डुलिपियाँ तैयार की हैं।
पाठालोचन की उपादेयता – ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ का उदाहरण
आरंभिक प्रकाशनों में केवल 10-15 पाण्डुलिपियों के आधार पर संपादन हुआ, जिससे कई प्रासंगिक पाठ छूट गए। जब कश्मीर की प्राचीनतम शारदा पाण्डुलिपियों का अध्ययन किया गया, तो कालिदास का अधिक मौलिक और भौगोलिक दृष्टि से सत्यनिष्ठ पाठ सामने आया –
प्रचलित (मिश्रित) पाठ (चौथें अंक में शकुंतला की विदाई का प्रसंग) –
शकुंतला पिता काश्यप से कहती है—“कथमिदानीं तातस्याङ्कात् परिभ्रष्टा मलयपर्वतोन्मूलिता चन्दनलतेव देशान्तरे जीवितं धारयिष्ये।” (मैं पिता की गोद से अलग होकर, मलय पर्वत से उखड़ी हुई चंदनलता की तरह दूसरे देश में कैसे जिऊँगी?)
यहाँ कश्मीर के लिए मलय पर्वत और चंदन लता का रूपक भौगोलिक रूप से असंगत लगता है।
कश्मीर की प्राचीन ‘शारदा’ प्रति का पाठ –
शकुंतला कहती है—“कथमिदानीं तातेन विरहिता करिसार्थपरिभ्रष्टा करेणुकेव प्राणान् धारयिष्ये।” (मैं पिता से अलग होकर, हाथियों के झुंड से बिछड़ी हुई हथिनी के बच्चे की तरह कैसे प्राण धारण करूँगी?)
यह पाठ कश्मीरी परिवेश (जहाँ हाथी पाए जाते थे) और शकुंतला की स्थिति के सर्वथा अनुकूल है।
इसके अतिरिक्त, शारदा प्रतियों में काश्यप का एक अत्यंत दार्शनिक श्लोक भी अधिक मिलता है, जो अन्यत्र लुप्त था –
यदा शरीरस्य शरीरिणश्च पृथक्त्वम् एकान्तत एव भावि ।
आहार्ययोगेन विभज्यमानः (वियुज्यमानः) परेण को नाम भवेद् विषादी ।। (4-23)
(जब शरीर और आत्मा का अलग होना निश्चित है, तो बाहरी संयोगों के वियोग पर कौन बुद्धिमान शोक करेगा?) इस श्लोक से भाव-जगत का वृत्त पूर्ण होता है।


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