राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन: उद्देश्य, कार्यप्रणाली एवं भारत के प्रमुख हस्तलेखागार
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राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन: उद्देश्य, कार्यप्रणाली एवं भारत के प्रमुख हस्तलेखागार

राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन (National Mission for Manuscripts – NMM) भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा फरवरी 2003 में स्थापित एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। भारत की अमूल्य हस्तलिखित विरासत को खोजने, उसे संरक्षित करने और उसे दुनिया के सामने लाने के लिए यह विश्व का अपनी तरह का सबसे बड़ा अभियान है। इस विस्तृत विवेचन में…

The Beginning of Systematic Manuscript Collection and Cataloguing in India Contributions of Scholars and Institutions
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भारत में हस्तलेखों के व्यवस्थित संग्रह एवं सूचिकरण का प्रारम्भ तथा विद्वानों और संस्थाओं का योगदान

भारत में हस्तलेखों (पाण्डुलिपियों) का व्यवस्थित संग्रह और सूचीकरण केवल एक शैक्षणिक कार्य नहीं था, बल्कि यह भारत की खोई हुई बौद्धिक पहचान को पुनः प्राप्त करने का एक महाअभियान था। इस विस्तृत विवेचन में हम इस प्रक्रिया के उद्भव, स्वर्णिम काल, प्रमुख विद्वानों और संस्थाओं के योगदान का सूक्ष्म विश्लेषण करेंगे। भारत में हस्तलेखों…

Writing Surfaces and Instruments Used in Ancient
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प्राचीन भारत में लेखन के लिए कौन-कौन से साधन प्रयोग किये जाते थे ।

प्राचीन भारत में ज्ञान की परंपरा ‘श्रुति’ (सुनकर याद रखना) से शुरू हुई थी, लेकिन समय के साथ जटिल दार्शनिक विचारों, वैज्ञानिक खोजों और धार्मिक ग्रंथों को सुरक्षित रखने के लिए लेखन कला का विकास हुआ। भारतीय विद्वानों ने अपने आसपास की प्रकृति से ही उन साधनों को खोजा जिन्होंने सदियों तक हमारे इतिहास को…

भारतीय ज्ञान के संरक्षण में हस्तलेख विज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता

भारतीय ज्ञान के संरक्षण में हस्तलेख विज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता

भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Systems) विश्व की प्राचीनतम और समृद्धतम संस्कृतियों में से एक है। इस ज्ञान का अधिकांश हिस्सा सदियों तक श्रुति (सुनने) और स्मृति (याद रखने) पर आधारित था, लेकिन बाद के कालखंडों में इसे पाण्डुलिपियों या हस्तलेखों (Manuscripts) के रूप में लिपिबद्ध किया गया। भारतीय ज्ञान के संरक्षण में हस्तलेख विज्ञान…

The Importance of Manuscriptology and the Utility of Its Auxiliary Disciplines

पाण्डुलिपिविज्ञान के अध्ययन का महत्त्व एवं उसके सहायक शास्त्रों की उपयोगिता

पाण्डुलिपिविज्ञान (Manuscriptology) केवल प्राचीन पुस्तकों का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह लुप्त होती सभ्यता और संस्कृति को पुनर्जीवित करने का एक विज्ञान है। इस विषय के दो मुख्य स्तंभों पर आधारित है: महत्व और सहायक शास्त्र। 1. पाण्डुलिपिविज्ञान के अध्ययन का महत्त्व (Significance of Manuscriptology) पाण्डुलिपियाँ हमारे पूर्वजों की बौद्धिक विरासत का भौतिक प्रमाण हैं।…

हस्तलेख-संग्रह एवं कैटलॉग-निर्माण के क्षेत्र में राजा राजेन्द्रलाल मित्र का योगदान

हस्तलेख-संग्रह एवं कैटलॉग-निर्माण के क्षेत्र में राजा राजेन्द्रलाल मित्र का योगदान

उन्नीसवीं सदी का बंगाल पुनर्जागरण केवल साहित्य और समाज सुधार तक सीमित नहीं था, बल्कि यह अपनी जड़ों की खोज का भी काल था। इस कालखंड में राजा राजेंद्रलाल मित्र (1822-1891) एक ऐसे प्रकाश स्तंभ के रूप में उभरे, जिन्होंने पश्चिमी वैज्ञानिक पद्धति और भारतीय पारंपरिक विद्वत्ता का मेल कराया। उन्हें “पहला आधुनिक भारतीय पुराविद”…

पाण्डुलिपि-विज्ञान की शाखाएँ एवं उपादेयता

पाण्डुलिपि-विज्ञान की शाखाएँ एवं उपादेयता

पाण्डुलिपि-विज्ञान की शाखाएँ एवं उपादेयताप्राचीन ग्रंथों के संरक्षण की समस्या (राजशेखर की काव्यमीमांसा के अनुसार)राजशेखर ने अपनी कृति ‘काव्यमीमांसा’ में हस्तलिखित ग्रंथों के पाठ-संक्रमण की असुरक्षा और भविष्य की आशंकाओं को व्यक्त किया है। उन्होंने निर्देश दिया है कि –सिद्धं च प्रबन्धम् अनेकादर्शगतं कुर्यात् ।अर्थात्, जब कोई ग्रंथ या प्रबंध सिद्ध (तैयार) हो जाए, तो…

पाण्डुलिपि के साधन अथवा उपकरण | Tools or Instruments for Manuscripts

पाण्डुलिपि के साधन अथवा उपकरण | Tools or Instruments for Manuscripts

पाण्डुलिपि लेखन में सहायक सामग्री को पाण्डुलिपि के साधन अथवा उपकरण कहा जाता है । इसमें पत्र, लेखनी तथा मसी (स्याही) इत्यादि सम्मिलित हैं । • पाषाण – लेखन के आरम्भिक काल में लेखन को उत्कीर्ण करके ही लिखा जाता रहा है । प्राचीन हस्तलिखित गुफा, शिला तथा स्तम्भों पर ही प्राप्त होते हैं ।…

संस्कृत कोशवाङ्मय विवरण  | Sanskrit Dictionary Literature

संस्कृत कोशवाङ्मय विवरण | Sanskrit Dictionary Literature

संस्कृत कोश वाङ्मय – कोश वाङ्मय संस्कृत साहित्य और भारतीय ज्ञान-परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है। संस्कृत भाषा में शब्दों के अर्थ, पर्यायवाची, विपरीतार्थक, और विशेष विवरण देने वाले कोशों का निर्माण प्राचीन काल से ही होता रहा है। ये कोश ग्रन्थ केवल शब्दों का संकलन नहीं करते हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा, और दर्शन…