हस्तलेख-संग्रह एवं कैटलॉग-निर्माण के क्षेत्र में राजा राजेन्द्रलाल मित्र का योगदान

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उन्नीसवीं सदी का बंगाल पुनर्जागरण केवल साहित्य और समाज सुधार तक सीमित नहीं था, बल्कि यह अपनी जड़ों की खोज का भी काल था। इस कालखंड में राजा राजेंद्रलाल मित्र (1822-1891) एक ऐसे प्रकाश स्तंभ के रूप में उभरे, जिन्होंने पश्चिमी वैज्ञानिक पद्धति और भारतीय पारंपरिक विद्वत्ता का मेल कराया। उन्हें “पहला आधुनिक भारतीय पुराविद” कहा जाता है। उनका सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी योगदान संस्कृत, प्राकृत और बौद्ध पांडुलिपियों का संग्रहण, संरक्षण और उनका वैज्ञानिक सूचीकरण था। जब भारतीय ज्ञान संपदा जर्जर घरों, नमी वाले मंदिरों और उपेक्षित बस्तों में नष्ट हो रही थी, तब राजेंद्रलाल ने उसे पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया।

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ‘कैटलॉगस कैटलॉगोरम’ का युग

1860 के दशक तक, ब्रिटिश सरकार को यह एहसास हो चुका था कि भारत के शासन और इसकी संस्कृति को समझने के लिए यहाँ के प्राचीन ग्रंथों का संरक्षण अनिवार्य है। 1868 में पंडित राधाकृष्ण की पहल पर भारत सरकार ने “संस्कृत पांडुलिपियों की खोज” (Discovery of Sanskrit Manuscripts) के लिए एक औपचारिक बजट और योजना स्वीकृत की। बंगाल प्रेसीडेंसी में इस भारी उत्तरदायित्व को निभाने के लिए ‘एशियाटिक सोसाइटी’ ने राजा राजेंद्रलाल मित्र को चुना। यह वह समय था जब मैक्स मूलर जैसे यूरोपीय विद्वान भारत की ओर देख रहे थे, लेकिन भारत के भीतर इस कार्य को वैज्ञानिक स्वरूप देने वाला कोई भारतीय विद्वान नहीं था।

2. ‘Notices of Sanskrit Manuscripts’: एक महान उपलब्धि

राजेंद्रलाल मित्र का सबसे बड़ा स्मारक उनके द्वारा संपादित ‘Notices of Sanskrit Manuscripts’ के नौ विशाल खंड हैं। यह केवल पुस्तकों की सूची नहीं थी, बल्कि पांडुलिपि विज्ञान का एक चलता-फिरता विश्वकोश था।

  • व्यापक अन्वेषण: उन्होंने बंगाल, बिहार और उड़ीसा के उन सुदूर क्षेत्रों की यात्रा की जहाँ आवागमन अत्यंत कठिन था। उन्होंने उन रूढ़िवादी पंडितों और जमींदारों को मनाया जो अपनी पांडुलिपियों को किसी बाहरी व्यक्ति को दिखाना “अपवित्र” मानते थे।
  • विवरणात्मक शैली: उनकी सूचीकरण पद्धति में निम्नलिखित तत्व अनिवार्य थे:
    1. पांडुलिपि का शीर्षक और विषय।
    2. लेखक और यदि संभव हो तो लिपिकार (Scribe) का नाम।
    3. पत्रों की संख्या, प्रति पृष्ठ पंक्तियाँ और अक्षर।
    4. लिपि (जैसे ब्राह्मी, नेवारी, शारदा, या बंगाली)।
    5. पांडुलिपि की भौतिक स्थिति (क्या वह ताड़पत्र पर है या कागज़ पर? क्या वह कीड़ों द्वारा खाया गया है?)।
    6. सबसे महत्वपूर्ण: Incipit (प्रारंभिक पंक्तियाँ) और Explicit (अंतिम पंक्तियाँ)। इससे यह सुनिश्चित होता था कि क्या यह कोई नया ग्रंथ है या किसी ज्ञात ग्रंथ का रूपांतरण।

3. ‘The Sanskrit Buddhist Literature of Nepal’: एक क्रांतिकारी कार्य

राजेंद्रलाल मित्र का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण योगदान नेपाल से प्राप्त बौद्ध संस्कृत पांडुलिपियों का सूचीकरण था। 1824 से 1844 के बीच बी.एच. हॉजसन ने नेपाल से भारी मात्रा में पांडुलिपियाँ एकत्र की थीं, जो एशियाटिक सोसाइटी में धूल फाँक रही थीं।

राजेंद्रलाल ने इन पर काम करना शुरू किया और 1882 में ‘The Sanskrit Buddhist Literature of Nepal’ प्रकाशित की।

  • महत्व: उस समय तक दुनिया मानती थी कि बौद्ध धर्म का मूल साहित्य केवल पाली भाषा में है। राजेंद्रलाल ने सिद्ध किया कि महायान बौद्ध धर्म का एक विशाल और अत्यंत समृद्ध साहित्य संस्कृत में भी उपलब्ध है।
  • विश्लेषण: उन्होंने केवल सूची नहीं बनाई, बल्कि ‘ललितविस्तर’, ‘अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता’ और ‘सद्धर्मपुण्डरीक’ जैसे ग्रंथों का विस्तृत सारांश दिया, जिससे पश्चिमी जगत दंग रह गया।

4. संपादन और पाठ्य-आलोचना (Textual Criticism)

पांडुलिपियों को केवल इकट्ठा करना पर्याप्त नहीं था; उन्हें पढ़ने योग्य बनाना और उनका संपादन करना भी राजेंद्रलाल का कार्य था। उन्होंने ‘बिब्लियोथिका इंडिका’ (Bibliotheca Indica) श्रृंखला के तहत कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का संपादन किया।

  • तैत्तरीय ब्राह्मण और गोपथ ब्राह्मण: इन वैदिक ग्रंथों का संपादन करते समय उन्होंने विभिन्न पांडुलिपियों के बीच के अंतर (Variant Readings) को पहचाना। यह आधुनिक ‘पाठ्य-आलोचना’ की शुरुआत थी।
  • अग्नि पुराण और कामन्दकीय नीतिसार: उन्होंने इन ग्रंथों के संपादन के माध्यम से प्राचीन भारतीय राजनीति और धर्मशास्त्र के कई अज्ञात पहलुओं को उजागर किया।

5. वैज्ञानिक कार्यप्रणाली और चुनौतियाँ

राजेंद्रलाल मित्र का कार्य आसान नहीं था। उन्हें कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा:

  • पंडितों का विरोध: कई ब्राह्मण विद्वान पांडुलिपियों को छूने तक नहीं देते थे। राजेंद्रलाल ने उन्हें समझाया कि यदि आज इनका विवरण दर्ज नहीं हुआ, तो यह ज्ञान हमेशा के लिए लुप्त हो जाएगा।
  • तकनीकी सीमाएँ: उस समय फोटोकॉपी या डिजिटल स्कैनिंग नहीं थी। उन्हें और उनके सहायकों को हाथ से नकल (Transcript) तैयार करनी पड़ती थी। राजेंद्रलाल ने नकल करने वालों (Copyists) के लिए कड़े नियम बनाए थे ताकि शुद्धता बनी रहे।
  • यूरोपीय विद्वानों से प्रतिस्पर्धा: उस समय कई यूरोपीय विद्वान भारतीय ज्ञान को “निम्न” मानते थे। राजेंद्रलाल ने अपनी तार्किक शक्ति और भाषा ज्ञान (लैटिन, ग्रीक, संस्कृत, जर्मन) से यह सिद्ध किया कि भारतीय विद्वान अपने इतिहास का विश्लेषण स्वयं करने में सक्षम हैं।

6. एशियाटिक सोसाइटी का आधुनिकीकरण

राजेंद्रलाल मित्र के लाइब्रेरी और पांडुलिपि विभाग से जुड़ने के बाद एशियाटिक सोसाइटी का स्वरूप बदल गया।

  • उन्होंने पांडुलिपियों के वर्गीकरण के लिए ‘विषय-वार’ (Subject-wise) पद्धति अपनाई।
  • उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण उचित तापमान और रसायनों (उस समय के उपलब्ध संसाधनों के अनुसार) के साथ किया जाए।
  • उनके कारण ही एशियाटिक सोसाइटी आज दुनिया में संस्कृत पांडुलिपियों का सबसे बड़ा केंद्र बनी हुई है।

7. वैचारिक निष्पक्षता और साहस

एक पांडुलिपि विशेषज्ञ के रूप में उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनकी सत्यनिष्ठा थी। उन्होंने ग्रंथों में जो पाया, वही समाज के सामने रखा। उदाहरण के लिए, जब उन्होंने प्राचीन ग्रंथों के आधार पर “Beef in Ancient India” (प्राचीन भारत में गोमांस) पर लेख लिखा, तो उन्हें कट्टरपंथियों का कोपभाजन बनना पड़ा। लेकिन एक सच्चे वैज्ञानिक की तरह उन्होंने कहा कि पांडुलिपियों के प्रमाणों को झुठलाया नहीं जा सकता।

8. बाद के विद्वानों पर प्रभाव

राजेंद्रलाल मित्र ने जो नींव रखी, उसी पर आगे चलकर महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री जैसे विद्वानों ने काम किया। हरप्रसाद शास्त्री उनके प्रिय शिष्य थे, जिन्होंने बाद में नेपाल से ‘चर्यापद’ (बंगाली साहित्य की सबसे पुरानी रचना) की खोज की। यदि राजेंद्रलाल ने सूचीकरण की वह वैज्ञानिक परंपरा शुरू न की होती, तो भारत का आधा मध्यकालीन और प्राचीन इतिहास आज भी अंधकार में होता।

9. वर्तमान समय में प्रासंगिकता

आज जब हम पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण (Digitization) कर रहे हैं, तो राजेंद्रलाल मित्र द्वारा तैयार किए गए ‘Notices’ और ‘Catalogues’ ही हमारे मुख्य मार्गदर्शक हैं। उनके द्वारा की गई टिप्पणियाँ आज भी यह पहचानने में मदद करती हैं कि कौन सी पांडुलिपि कितनी पुरानी और प्रामाणिक है।

राजा राजेंद्रलाल मित्र केवल एक लाइब्रेरियन या अनुवादक नहीं थे; वे भारतीय ज्ञान के उस ‘गुमनाम खजाने’ के पहले आधुनिक खोजकर्ता थे। पांडुलिपि संग्रह और सूचीकरण में उनका योगदान किसी तपस्या से कम नहीं था। उन्होंने धूल और अंधेरे में दबे हुए पन्नों को निकालकर उन्हें ‘इतिहास’ का दर्जा दिया।

रवींद्रनाथ टैगोर ने उनके बारे में बिल्कुल सही कहा था कि, “राजेंद्रलाल ने हमें केवल ज्ञान नहीं दिया, बल्कि हमें अपनी सभ्यता पर गर्व करना सिखाया, जो अंधविश्वास पर नहीं बल्कि प्रमाणों पर आधारित थी।” उनका कार्य आज भी हर उस शोधार्थी के लिए अनिवार्य है जो भारत के वास्तविक अतीत को समझना चाहता है।


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