Writing Surfaces and Instruments Used in Ancient
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प्राचीन भारत में लेखन के लिए कौन-कौन से साधन प्रयोग किये जाते थे ।

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प्राचीन भारत में ज्ञान की परंपरा ‘श्रुति’ (सुनकर याद रखना) से शुरू हुई थी, लेकिन समय के साथ जटिल दार्शनिक विचारों, वैज्ञानिक खोजों और धार्मिक ग्रंथों को सुरक्षित रखने के लिए लेखन कला का विकास हुआ। भारतीय विद्वानों ने अपने आसपास की प्रकृति से ही उन साधनों को खोजा जिन्होंने सदियों तक हमारे इतिहास को जीवित रखा।

1. लेखन सामग्री का वर्गीकरण

प्राचीन काल में उपयोग किए जाने वाले लेखन माध्यमों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:

अ) आलेखीय विधियाँ (Hard/Inscribed Mediums)

ये वे माध्यम थे जिन पर अक्षरों को खोदकर या उत्कीर्ण करके लिखा जाता था। इनका उपयोग लंबे समय तक सुरक्षित रखने और राजकीय आदेशों के लिए किया जाता था।

  • शिलालेख (Inscriptions): चट्टानों और पत्थरों पर उत्कीर्ण लेख। सम्राट अशोक के शिलालेख इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।
  • धातु पत्र (Metal Plates): मुख्य रूप से तांबे (ताम्रपत्र) का उपयोग भूमि दान और राजकीय सनद के लिए होता था। इसके अलावा सोना, चांदी और लोहे का भी प्रयोग मिलता है।
  • काष्ठ (Wood): लकड़ी की पट्टिकाओं पर भी लिखने की परंपरा थी।

ब) पांडुलिपि विधियाँ (Soft/Portable Mediums)

ये कोमल माध्यम थे जिन पर स्याही से लिखा जाता था। ये दैनिक कार्यों और ग्रंथों की रचना के लिए अधिक लोकप्रिय थे।

  • भूर्जपत्र (Birch Bark): हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाले भूर्ज वृक्ष की छाल।
  • ताड़पत्र (Palm Leaf): दक्षिण भारत में व्यापक रूप से प्रचलित ‘ताल’ वृक्ष के पत्ते।
  • कागज (Paper): भारत में कागज का उपयोग 10वीं-11वीं शताब्दी के आसपास व्यापक हुआ।
  • वस्त्र (Cloth): सूती कपड़ों को लेई लगाकर सुखाने के बाद उन पर भी लिखा जाता था।

2. प्रमुख लेखन उपकरण (Tools for Writing)

प्राचीन लेखन की प्रक्रिया में केवल माध्यम ही नहीं, बल्कि सटीक उपकरणों का भी विशेष महत्व था।

लेखनी (Stylus/Pen)

लेखनी विभिन्न प्रकार की होती थी, जो माध्यम के अनुसार चुनी जाती थी:

  • सकरकण्डे की लेखनी (Reed Pen): नरकुल या सरकण्डे से बनी लेखनी, जिसका उपयोग स्याही के साथ कोमल माध्यमों पर किया जाता था।
  • घंटम (Metal Stylus): ताड़पत्रों पर लिखने के लिए लोहे या पीतल के नुकीले ‘घंटम’ का प्रयोग होता था, जिससे पत्तों पर अक्षरों को कुरेदा जाता था।
  • तूलिका (Brush): कोमल चित्रकारी या सजावटी लेखन के लिए।
  • वर्णवर्तिका (Pencil/Crayon): रेखांकन के लिए प्रयुक्त होने वाली खड़िया या कोयले की पेंसिल।

मसि (Ink)

प्राचीन भारत में स्याही का निर्माण प्राकृतिक स्रोतों से किया जाता था:

  • काली स्याही: कज्जल (काजल) और गोंद के मिश्रण से।
  • रंगीन स्याही: गेरू, सिंदूर और नील से।
  • स्वर्ण और रजत मसि: अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथों के लिए सोने और चांदी के चूर्ण का उपयोग होता था।

3. पांडुलिपि लेखन की परंपराएँ

पांडुलिपियों (Manuscripts) का निर्माण एक अनुशासित कला थी। इसमें केवल लिखना ही नहीं, बल्कि उसके संरक्षण की भी पूरी व्यवस्था शामिल थी।

  • ग्रन्थि (Binding): ताड़पत्रों या भूर्जपत्रों के बीच में छेद करके उन्हें डोरी (सूत्र) से पिरोया जाता था। इसी ‘ग्रन्थि’ शब्द से ‘ग्रंथ’ की उत्पत्ति हुई।
  • वेष्टन (Cover): पांडुलिपियों को धूल और कीड़ों से बचाने के लिए उन्हें लकड़ी के तख्तों (काष्ठ पट्टिका) के बीच दबाकर कपड़े (वेष्टन) में लपेटा जाता था।
  • पुष्पिका (Colophon): पांडुलिपि के अंत में लेखक अपना नाम, तिथि और स्थान का विवरण लिखता था, जिसे पुष्पिका कहा जाता है।

4. प्रमुख लेखन माध्यमों का विवरण

ताड़पत्र (Palm Leaf)

यह दक्षिण और पूर्वी भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय था। ताड़ के पत्तों को सुखाकर, उबालकर और पॉलिश करके लेखन योग्य बनाया जाता था। इन पर लेखन के बाद कोयले का लेप लगाया जाता था ताकि कुरेदे गए अक्षर स्पष्ट दिखें।

भूर्जपत्र (Birch Bark)

हिमालय में 14,000 फीट की ऊंचाई पर मिलने वाले भूर्ज वृक्ष की आंतरिक छाल का उपयोग किया जाता था। यह अत्यंत लचीला और टिकाऊ होता था। कश्मीरी भूर्जपत्रों पर लिखे गए प्राचीन ग्रंथ आज भी दुनिया भर के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।

ताम्रपत्र (Copper Plates)

भूमि अनुदान और राजकीय अधिकारों को प्रमाणित करने के लिए तांबे की प्लेटों का उपयोग होता था। इन प्लेटों को अक्सर एक अंगूठी के माध्यम से जोड़ा जाता था, जिस पर राजकीय मुहर (Seal) लगी होती थी।

5. लेखन परंपरा की विशेषताएँ

भारतीय पांडुलिपि विज्ञान के कुछ सामान्य नियम थे:

  1. पंक्तिबद्धता: लेखन हमेशा सीधी रेखा में होता था।
  2. विराम चिह्न: वाक्यों को अलग करने के लिए खड़ी पाई (|) या दोहरी खड़ी पाई (||) का प्रयोग।
  3. संकेताक्षर: जगह बचाने के लिए शब्दों का संक्षिप्त रूप लिखना।
  4. संशोधन: यदि लिखते समय त्रुटि हो जाती, तो उसे ‘हड़ताल’ (पीला लेप) लगाकर सुधारा जाता था।

प्राचीन भारत के ये लेखन साधन केवल उपकरण नहीं थे, बल्कि भारतीय मेधा और प्रकृति के बीच के सामंजस्य का प्रतीक थे। भूर्जपत्र से लेकर ताम्रपत्र तक की यह यात्रा दिखाती है कि कैसे हमारे पूर्वजों ने ज्ञान को अमर बनाने के लिए हर संभव माध्यम का सृजन किया। आज के डिजिटल युग में, इन साधनों का अध्ययन हमारी समृद्ध बौद्धिक विरासत को समझने के लिए अनिवार्य है।


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