भारत में हस्तलेखों के व्यवस्थित संग्रह एवं सूचिकरण का प्रारम्भ तथा विद्वानों और संस्थाओं का योगदान
भारत में हस्तलेखों (पाण्डुलिपियों) का व्यवस्थित संग्रह और सूचीकरण केवल एक शैक्षणिक कार्य नहीं था, बल्कि यह भारत की खोई हुई बौद्धिक पहचान को पुनः प्राप्त करने का एक महाअभियान था। इस विस्तृत विवेचन में हम इस प्रक्रिया के उद्भव, स्वर्णिम काल, प्रमुख विद्वानों और संस्थाओं के योगदान का सूक्ष्म विश्लेषण करेंगे।
भारत में हस्तलेखों का व्यवस्थित संग्रह और सूचीकरण
1. भूमिका: हस्तलेखों का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्य
भारत ‘श्रुति’ और ‘स्मृति’ की परंपरा का देश रहा है, जहाँ ज्ञान कंठस्थ किया जाता था। परंतु, ज्ञान के विस्तार और उसके संरक्षण की आवश्यकता ने ‘लेखन’ को जन्म दिया। भारत में उपलब्ध पाण्डुलिपियाँ केवल कागज या ताड़पत्र के टुकड़े नहीं हैं; वे आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान, दर्शन, व्याकरण और साहित्य का जीवित साक्ष्य हैं। इन हस्तलेखों के व्यवस्थित संग्रह की आवश्यकता तब महसूस की गई जब औपनिवेशिक काल में भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों को यह आभास हुआ कि भारत का वास्तविक इतिहास इन धूल भरी अलमारियों में दबा हुआ है।
2. व्यवस्थित संग्रह और सूचीकरण का आरंभ (18वीं और 19वीं शताब्दी)
व्यवस्थित संग्रह का कार्य मुख्य रूप से तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है:
क. प्रारंभिक चरण (एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना – 1784)
भारत में पाण्डुलिपियों के वैज्ञानिक संग्रह की नींव सर विलियम जोन्स द्वारा 15 जनवरी, 1784 को ‘एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल’ की स्थापना के साथ पड़ी। जोन्स ने महसूस किया कि संस्कृत भाषा और उसका साहित्य विश्व की प्राचीनतम धरोहर है।
- संग्रह का उद्देश्य: जोन्स और उनके साथियों का प्राथमिक उद्देश्य भारतीय कानूनों (धर्मशास्त्रों) को समझना था ताकि वे भारत पर बेहतर शासन कर सकें।
- उपलब्धि: इसी काल में ‘मनुस्मृति’ और ‘अभिज्ञानशाकुंतलम’ जैसी कृतियों को खोजा और अनुवादित किया गया।
ख. 1868 का ऐतिहासिक प्रस्ताव (The Government Order of 1868)
भारत में पाण्डुलिपि विज्ञान के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1868 में आया। पंडित राधाकृष्ण (लाहौर) ने तत्कालीन वायसराय को पत्र लिखकर आग्रह किया कि भारत भर के निजी संग्रहों में बिखरी हुई पाण्डुलिपियों को नष्ट होने से बचाया जाए।
- इसके बाद भारत सरकार ने प्रतिवर्ष 24,000 रुपये का बजट स्वीकृत किया।
- इस योजना के तहत देश को विभिन्न क्षेत्रों (बॉम्बे, मद्रास, बंगाल, बनारस) में बांटा गया और प्रमुख विद्वानों को ‘खोज’ (Search) के लिए नियुक्त किया गया।
3. प्रमुख विद्वानों का योगदान
3.1 राजा राजेंद्रलाल मित्र (Raja Rajendralal Mitra)
जैसा कि पूर्व में चर्चा की गई, राजेंद्रलाल मित्र आधुनिक सूचीकरण (Cataloguing) के पितामह हैं।
- कार्य प्रणाली: उन्होंने ‘Notices of Sanskrit Manuscripts’ के 9 खंड तैयार किए। उन्होंने केवल नाम नहीं लिखे, बल्कि पांडुलिपि के भौतिक गुण, लिपि, लेखक का परिचय और उसके प्रारंभ-अंत की पंक्तियों को दर्ज किया।
- महत्व: उन्होंने पहली बार भारतीय विद्वानों को यह दिखाया कि पश्चिमी वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग करके अपनी विरासत को कैसे व्यवस्थित किया जाए।
3.2 सर आर.जी. भंडारकर (Sir R.G. Bhandarkar)
बॉम्बे प्रेसीडेंसी में हस्तलेखों के संग्रह का श्रेय डॉ. रामकृष्ण गोपाल भंडारकर को जाता है।
- खोज यात्राएँ: उन्होंने खानदेश, गुजरात और राजस्थान का दौरा किया और हज़ारों दुर्लभ जैन और संस्कृत ग्रंथ एकत्रित किए।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण: भंडारकर ने पांडुलिपियों के काल-निर्धारण (Dating) पर विशेष जोर दिया। उनके द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट आज भी शोधार्थियों के लिए मानक हैं।
3.3 महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री (H.P. Shastri)
राजेंद्रलाल मित्र के शिष्य हरप्रसाद शास्त्री ने इस परंपरा को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।
- नेपाल अभियान: उन्होंने नेपाल की कई यात्राएँ कीं और वहां के शाही पुस्तकालय से ‘चर्यापद’ जैसे दुर्लभ बौद्ध-सिद्ध ग्रंथों की खोज की, जिसने बंगाली और अन्य भारतीय भाषाओं के इतिहास को बदल दिया।
- विवरणात्मक सूची: उन्होंने एशियाटिक सोसाइटी की हज़ारों पांडुलिपियों की विवरणात्मक सूचियाँ (Descriptive Catalogues) तैयार कीं।
3.4 फ्रेडरिक मैक्स मूलर (Max Müller)
हालाँकि वे भारत नहीं आए, लेकिन उन्होंने ‘सेक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट’ श्रृंखला के माध्यम से भारत से एकत्र की गई पांडुलिपियों के संपादन और प्रकाशन का वैश्विक स्तर पर नेतृत्व किया।
4. प्रमुख संस्थाओं का योगदान
भारतीय ज्ञान के संरक्षण में कुछ संस्थाओं ने ‘ज्ञान के मंदिर’ के रूप में कार्य किया:
1 एशियाटिक सोसाइटी (कोलकाता, मुंबई)
यह वह स्थान था जहाँ पहली बार पांडुलिपियों को पुस्तकालय के रूप में व्यवस्थित किया गया। यहाँ के ‘बिब्लियोथिका इंडिका’ (Bibliotheca Indica) श्रृंखला ने पांडुलिपियों को प्रिंट रूप में लाकर आम जनता तक पहुँचाया।
2 भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI, पुणे)
1917 में स्थापित इस संस्थान ने डॉ. भंडारकर के संग्रह को आधार बनाकर काम शुरू किया।
- महाभारत प्रोजेक्ट: बोरी (BORI) का सबसे बड़ा योगदान महाभारत का समीक्षात्मक संस्करण (Critical Edition) तैयार करना है। इसके लिए उन्होंने पूरे भारत और विदेशों से 1200 से अधिक पांडुलिपियों का मिलान किया।
3 सरस्वती महल पुस्तकालय (तंजावुर)
यह दुनिया के सबसे पुराने पुस्तकालयों में से एक है। मराठा राजा सरफोजी द्वितीय ने दक्षिण भारत में हजारों पांडुलिपियों को सहेजने का कार्य किया। यहाँ ताड़पत्रों का अद्भुत संग्रह है।
4 ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (मैसूर और बड़ौदा)
- मैसूर: यहाँ आर. शामाशस्त्री ने ‘कौटिल्य के अर्थशास्त्र’ की पांडुलिपि खोजी, जिसने भारतीय राजनीति के इतिहास को वैश्विक स्तर पर पुनर्स्थापित किया।
- बड़ौदा: ‘गायकवाड़ ओरिएंटल सीरीज’ के माध्यम से सैकड़ों पांडुलिपियों का संपादन हुआ।
5. सूचीकरण की प्रविधियाँ (Cataloguing Techniques)
हस्तलेखों के व्यवस्थित संग्रह के लिए विद्वानों ने कुछ विशेष तकनीकें विकसित कीं:
- सूची (Lists): केवल ग्रंथों के नाम।
- वर्णनात्मक सूची (Descriptive Catalogue): इसमें ग्रंथ का आकार, पत्र संख्या, लिपि, लेखक, विषय और प्रतिलिपिकार का विवरण होता है।
- समीक्षात्मक सूची (Critical Catalogue): विभिन्न प्रतियों की तुलना और उनके पाठ्य-भेद का विवरण।
- New Catalogus Catalogorum (NCC): मद्रास विश्वविद्यालय द्वारा शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट दुनिया की सभी संस्कृत पांडुलिपियों की एक वर्णमाला के अनुसार मास्टर लिस्ट तैयार करने का प्रयास है।
6. आधुनिक युग और राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन (NAMAMI)
21वीं सदी में हस्तलेख संरक्षण ने एक डिजिटल मोड़ लिया।
- स्थापना (2003): भारत सरकार के पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय ने ‘राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन’ की स्थापना की।
- उद्देश्य: भारत में बिखरी हुई लगभग 50 लाख पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, सूचीकरण और संरक्षण करना।
- कृतियाँ: मिशन ने ‘कृतिसंपदा’ नामक एक डिजिटल डेटाबेस तैयार किया है, जहाँ लाखों पांडुलिपियों की जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध है।
7. चुनौतियाँ और भविष्य की आवश्यकता
हस्तलेखों के संग्रह में आज भी कई चुनौतियाँ हैं:
- निजी संग्रह: आज भी हज़ारों पाण्डुलिपियाँ निजी घरों में उपेक्षित हैं।
- भाषाविदों की कमी: प्राचीन लिपियों (जैसे ग्रंथ, शारदा, मोड़ी) को पढ़ने वाले विशेषज्ञों की संख्या कम हो रही है।
- जलवायु: भारत की उष्णकटिबंधीय जलवायु पांडुलिपियों के लिए घातक है।
भारत में हस्तलेखों का व्यवस्थित संग्रह केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं था, बल्कि यह भारत की ‘स्मृति’ को पुनः प्राप्त करने का प्रयास था। 1868 के सरकारी प्रस्ताव से शुरू हुआ यह सफर आज ‘डिजिटल इंडिया’ के माध्यम से वैश्विक स्तर पर पहुँच चुका है। राजा राजेंद्रलाल मित्र से लेकर वर्तमान के राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन तक, हज़ारों गुमनाम विद्वानों ने अपना जीवन इन धूल भरे पन्नों को समर्पित कर दिया ताकि आधुनिक भारत अपनी जड़ों को न भूले।
हस्तलेख विज्ञान का अध्ययन हमें यह सिखाता है कि सत्य केवल वह नहीं है जो वर्तमान में उपलब्ध है, बल्कि वह है जो अतीत के इन सुरक्षित हस्तलेखों में प्रमाणों के साथ जीवित है।


