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राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन: उद्देश्य, कार्यप्रणाली एवं भारत के प्रमुख हस्तलेखागार

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राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन (National Mission for Manuscripts – NMM) भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा फरवरी 2003 में स्थापित एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। भारत की अमूल्य हस्तलिखित विरासत को खोजने, उसे संरक्षित करने और उसे दुनिया के सामने लाने के लिए यह विश्व का अपनी तरह का सबसे बड़ा अभियान है। इस विस्तृत विवेचन में हम इस मिशन के उद्देश्यों, इसकी कार्यप्रणाली और भारत के प्रमुख हस्तलेखागारों (Manuscript Repositories) का विश्लेषण करेंगे।

1. भूमिका: मिशन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भारत में अनुमानतः 50 लाख से 1 करोड़ पाण्डुलिपियाँ हैं। ये पाण्डुलिपियाँ संस्कृत, प्राकृत, पाली, अरबी, फारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध हैं। ये केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि इनमें प्राचीन भारत के विज्ञान, गणित, चिकित्सा (आयुर्वेद), संगीत और स्थापत्य कला का रहस्य छिपा है।

20वीं सदी के अंत तक यह महसूस किया गया कि हज़ारों पाण्डुलिपियाँ निजी घरों, मंदिरों और मठों में उपेक्षा के कारण नष्ट हो रही हैं। इसी संकट को देखते हुए ‘राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन’ (NAM/NMM) की परिकल्पना की गई।

. मिशन के मुख्य उद्देश्य (Objectives of NMM)

राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन का मोटो है: “प्राचीन भारत की विरासत, आधुनिक भारत का भविष्य”। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  • पाण्डुलिपियों की खोज और पहचान (Survey and Documentation): भारत के कोने-कोने में छिपी पाण्डुलिपियों को खोजना और उनका एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना।
  • संरक्षण (Conservation): प्राचीन पाण्डुलिपियों को भौतिक रूप (Physical Conservation) और रासायनिक उपचार के माध्यम से नष्ट होने से बचाना।
  • पहुँच और प्रसार (Access and Outreach): पाण्डुलिपियों का डिजिटलीकरण (Digitization) करना ताकि दुनिया भर के विद्वान और शोधार्थी उन्हें आसानी से ऑनलाइन पढ़ सकें।
  • प्रशिक्षण (Capacity Building): अगली पीढ़ी के लिए ‘पाण्डुलिपि विशेषज्ञों’ (Manuscriptologists) और ‘संरक्षण विशेषज्ञों’ को तैयार करना।
  • प्रकाशन (Publication): अप्रकाशित और दुर्लभ पाण्डुलिपियों का संपादन करके उन्हें पुस्तकों के रूप में प्रकाशित करना।

3. कार्यप्रणाली: मिशन कैसे काम करता है? (Methodology)

मिशन अपनी गतिविधियों को एक विकेंद्रीकृत (Decentralized) नेटवर्क के माध्यम से संचालित करता है। इसकी कार्यप्रणाली को पाँच मुख्य स्तंभों में बांटा जा सकता है:

क. पाण्डुलिपि संसाधन केंद्र (MRC – Manuscript Resource Centres)

मिशन ने पूरे भारत में लगभग 100 से अधिक संस्थानों (विश्वविद्यालयों, संग्रहालयों और पुस्तकालयों) को MRC के रूप में मान्यता दी है। ये केंद्र अपने क्षेत्र में पाण्डुलिपियों का सर्वेक्षण करते हैं और उनका विवरण मिशन के मुख्यालय को भेजते हैं।

ख. पाण्डुलिपि संरक्षण केंद्र (MCC – Manuscript Conservation Centres)

संरक्षण के लिए विशिष्ट प्रयोगशालाएं बनाई गई हैं। यहाँ विशेषज्ञ ‘नॉन-इनवेसिव’ तकनीकों का उपयोग करते हैं।

  • भौतिक संरक्षण: सफाई, धुएं से उपचार (Fumigation) और फटी हुई पाण्डुलिपियों की मरम्मत।
  • निवारक संरक्षण: नीम के तेल, लेमनग्रास तेल और विशेष रसायनों का उपयोग करके कीड़ों से बचाव।

ग. राष्ट्रीय डेटाबेस – ‘कृतिसंपदा’ (Kritisampada)

यह मिशन की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि है। मिशन ने एक राष्ट्रीय ई-कैटलॉग तैयार किया है जिसे ‘कृतिसंपदा’ कहा जाता है। इसमें अब तक लगभग 50 लाख पाण्डुलिपियों का विवरण डिजिटल रूप में उपलब्ध है।

घ. जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम

  • तत्वबोध: पाण्डुलिपियों के विभिन्न विषयों पर विद्वानों के व्याख्यान।
  • संवर्धन: पांडुलिपि विज्ञान और लिपि विज्ञान (Palaeography) पर कार्यशालाएं।
  • प्रदर्शनी: आम जनता को अपनी विरासत से जोड़ने के लिए ‘अभिलेख’ नामक प्रदर्शनियाँ।

ङ. डिजिटलीकरण (Digitization)

मिशन का लक्ष्य हर पाण्डुलिपि की उच्च-गुणवत्ता वाली डिजिटल इमेज बनाना है ताकि मूल प्रति को बार-बार छूने की आवश्यकता न पड़े और वह सुरक्षित रहे।

4. भारत के प्रमुख हस्तलेखागार (Major Manuscript Repositories in India)

भारत में पाण्डुलिपियों का भंडार अविश्वसनीय है। नीचे कुछ ऐसे प्रमुख संस्थानों का विवरण है जो ज्ञान के वास्तविक संरक्षक हैं:

1. भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI), पुणे

  • महत्व: यहाँ 28,000 से अधिक दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ हैं।
  • विशेषता: ऋग्वेद की सबसे पुरानी पाण्डुलिपि यहीं सुरक्षित है, जिसे यूनेस्को (UNESCO) की ‘मेमरी ऑफ द वर्ल्ड’ रजिस्टर में शामिल किया गया है।

2. खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी, पटना

  • महत्व: यह अरबी और फारसी पाण्डुलिपियों का दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है।
  • विशेषता: यहाँ मुग़ल काल की अत्यंत दुर्लभ सचित्र पाण्डुलिपियाँ (Illustrated Manuscripts) मौजूद हैं।

3. तंजावुर महाराजा सरफोजी सरस्वती महल पुस्तकालय, तमिलनाडु

  • महत्व: इसे दुनिया के सबसे पुराने पुस्तकालयों में गिना जाता है।
  • विशेषता: यहाँ ताड़पत्र (Palm leaf) पर दक्षिण भारतीय भाषाओं और संस्कृत का अद्भुत संग्रह है।

4. राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum), नई दिल्ली

  • महत्व: यहाँ विभिन्न शैलियों और कालखंडों की पाण्डुलिपियों का एक विशाल संग्रह है।
  • विशेषता: यहाँ सचित्र ‘बाबरनामा’ और ‘महाभारत’ की प्राचीन प्रतियाँ संरक्षित हैं।

5. ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (ORI), मैसूर

  • महत्व: यहाँ लगभग 70,000 पाण्डुलिपियाँ हैं।
  • विशेषता: इसी संस्थान में आर. शामाशस्त्री ने कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ की खोज की थी।

6. एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता

  • महत्व: भारत में व्यवस्थित सूचीकरण की जननी।
  • विशेषता: यहाँ 18वीं और 19वीं शताब्दी में एकत्र की गई हज़ारों दुर्लभ संस्कृत और बौद्ध पाण्डुलिपियाँ हैं।

7. वृंदावन शोध संस्थान (Vrindavan Research Institute)

  • महत्व: भक्ति कालीन साहित्य और ब्रज भाषा की पाण्डुलिपियों का यह मुख्य केंद्र है।

5. मिशन की उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ

उपलब्धियाँ:

  1. सर्वेक्षण: अब तक भारत के लगभग 600 जिलों में सर्वेक्षण पूरा हो चुका है।
  2. संरक्षण: लाखों पाण्डुलिपियों को वैज्ञानिक उपचार देकर उनकी आयु बढ़ा दी गई है।
  3. लिपि पुनरुद्धार: शारदा, मोड़ी, ग्रंथ और नेवारी जैसी मरती हुई लिपियों को सिखाने के लिए मिशन ने केंद्र खोले हैं।

चुनौतियाँ:

  • विशेषज्ञों का अभाव: पुरानी लिपियों को पढ़ने वाले विद्वान कम हो रहे हैं।
  • निजी उदासीनता: कई लोग धार्मिक मान्यताओं के कारण अपनी पाण्डुलिपियों को मिशन को देखने या स्कैन करने नहीं देते।
  • फंडिंग: इतने विशाल देश के लिए निरंतर वित्तीय सहायता की आवश्यकता होती है।

राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन केवल एक सरकारी विभाग नहीं है, बल्कि यह भारत की “बौद्धिक संप्रभुता” की रक्षा का एक कवच है। यदि ये पाण्डुलिपियाँ नहीं बचतीं, तो आयुर्वेद, योग और प्राचीन भारतीय विज्ञान के हमारे दावे केवल कहानियों तक सीमित रह जाते। आज ‘कृतिसंपदा’ और ‘राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन’ के प्रयासों के कारण, एक शोधार्थी दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर बनारस या मैसूर की पाण्डुलिपि का अध्ययन कर सकता है। यह मिशन हमारे “अतीत के ज्ञान” को “भविष्य की तकनीक” के साथ जोड़ने का सबसे सफल उदाहरण है।


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